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रक्षाबंधन-

यूं तो रक्षाबंधन की कई कथाएं हैं लेकिन हम यहां कुछ चर्चित कथाएं दे रहे हैं। इनमें से पहली कथा का धार्मिक महत्व है, जिसे पूजन के साथ कहा जाता है। बाकी की कथाएं भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक इस अनोखे त्योहार की महत्ता से संबंधित हैं।
रक्षाबंधन की पावन पौराणिक कथाएं ...
रक्षाबंधन कथा-1
एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा- 'हे अच्युत! मुझे रक्षाबंधन की वह कथा सुनाइए जिससे मनुष्यों की प्रेतबाधा तथा दुख दूर होता है।' भगवान कृष्ण ने कहा- हे पांडव श्रेष्ठ! एक बार दैत्यों तथा सुरों में युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा। असुरों ने देवताओं को पराजित करके उनके प्रतिनिधि इंद्र को भी पराजित कर दिया।
 
ऐसी दशा में देवताओं सहित इंद्र अमरावती चले गए। उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजपद से घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएँ तथा देवता व मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें। सभी लोग मेरी पूजा करें।
 
दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन-पाठन तथा उत्सव आदि समाप्त हो गए। धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा। यह देख इंद्र अपने गुरु वृहस्पति के पास गए तथा उनके चरणों में गिरकर निवेदन करने लगे- गुरुवर! ऐसी दशा में परिस्थितियाँ कहती हैं कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे। न तो मैं भाग ही सकता हूँ और न ही युद्धभूमि में टिक सकता हूँ। कोई उपाय बताइए।
 
वृहस्पति ने इंद्र की वेदना सुनकर उसे रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रातःकाल निम्न मंत्र से रक्षा विधान संपन्न किया गया।
 

'येन बद्धो बलिर्राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिवध्नामि रक्षे मा चल मा चलः।'
 
इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का तंतु लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बाँधकर युद्धभूमि में लड़ने के लिए भेज दिया। 'रक्षाबंधन' के प्रभाव से दैत्य भाग खड़े हुए और इंद्र की विजय हुई। राखी बाँधने की प्रथा का सूत्रपात यहीं से होता है।

रक्षाबंधन कथा-2
भारतीय इतिहास के अनुसार मुसलमान शासक भी रक्षाबंधन की धर्मभावना पर न्योछावर थे। जहाँगीर ने एक राजपूत स्त्री का रक्षा सूत्रपाकर समाज को विशिष्ट आदर्श प्रदान किया। इस संदर्भ में पन्ना की राखी विशेषतः उल्लेखनीय है। एक बार राजस्थान की दो रियासतों में गंभीर कलह चल रहा था। एक रियासत पर मुगलों ने आक्रमण कर दिया। अवसर पाकर दूसरी रियासत वाले राजपूत मुगलों का साथ देने के लिए सैन्य सज्जा कर रहे थे। पन्ना भी इन्हीं मुगलों के घेरे में थी। उसने दूसरी रियासत के शासक को, जो मुगलों की सहायतार्थ जा रहा था, राखी भेजी। राखी पाते ही उसने उलटे मुगलों पर आक्रमण कर दिया। मुगल पराजित हुए। इस तरह रक्षाबंधन के कच्चे धागे ने दोनों रियासतों के शासकों को पक्की मैत्री के सूत्र में बाँध दिया।

कृष्ण-द्रौपदी कथा
एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून की धार बह निकली। यह सब द्रौपदी से नहीं देखा गया और उसने तत्काल अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण के हाथ में बाँध दिया फलस्वरूप खून बहना बंद हो गया। कुछ समय पश्चात जब दुःशासन ने द्रौपदी की चीरहरण किया तब श्रीकृष्ण ने चीर बढ़ाकर इस बंधन का उपकार चुकाया। यह प्रसंग भी रक्षाबंधन की महत्ता प्रतिपादित करता है।

हुमायूं कर्णावती कथा
मध्यकालीन इतिहास की घटना है। चित्तौड़ की हिन्दूरानी कर्णावती ने दिल्ली के मुगल बादशाह हुमायूं को अपना भाई मानकर उनके पास राखी भेजी थी। हुमायूं ने रानी कर्णावती की राखी स्वीकार की और समय आने पर रानी के सम्मान की रक्षा के लिए गुजरात के बादशाह से युद्ध किया।


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श्रावण पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भारत के उन त्योहारों में से है, जिसे भारत के एक बड़े भू-भाग में मनाया जाता है। समय के साथ इस त्योहार में काफी बदलाव आए हैं, लेकिन इसकी मूल भावना आज भी बरकरार है। यह भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। वर्तमान में रक्षा बंधन ( rakshabandhan ) का जो स्वरूप है, उसकी शुरुआत कब हुई, यह कहना कठिन है, लेकिन रक्षा सूत्र बांधने का वर्णन हमारे पौराणिक ग्रंथों में बहुत पहले का मिलता है। मान्यता है कि जब देवताओं और असुरों का युद्ध (देवासुर संग्राम) हो रहा था, तब एक बार ऐसा लगने लगा कि असुर जीत जाएंगे। देवताओं का नेतृत्व इंद्र कर रहे थे। तब इंद्राणी यानी देवराज इंद्र की पत्नी शची देवताओं के गुरु बृहस्पति के पास गई थीं। देवगुरु ने उन्हें विजय के लिए रक्षा सूत्र बांधने को कहा। फिर शची ने युद्ध के लिए प्रस्थान कर रहे इंद्र के हाथों में रक्षा सूत्र बांधा। मान्यता है कि इसी रक्षा सूत्र के कारण देवता इस संग्राम में विजयी हुए। वह दिन श्रावण पूर्णिमा का था।

इसी रक्षा सूत्र की बदौलत माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को राजा बलि के बंधन से मुक्त करवाया था। महाभारत काल में रक्षा-सूत्र बांधने का उल्लेख मिलता है। द्रौपदी ने अपना आंचल फाड़ कर कृष्ण की उंगली में उसे बांधा था। कहा जाता है कि महाभारत के समय श्रीकृष्ण ने विजय के लिए युधिष्ठिर से रक्षा सूत्र बांधने को कहा था।


रक्षा बंधन के दिन पुरोहित भी अपने यजमानों को दाहिने हाथ में रक्षा सूत्र बांधते हैं। मान्यता है कि श्रावण पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र हो, तो वह बहुत फलदायी होता है। पहले के समय में ऋषि-मुनि श्रावण पूर्णिमा के दिन अपने शिष्यों का उपाकर्म कराकर उन्हें शिक्षा देना प्रारंभ करते थे।
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रक्षाबंधन के दिन सभी बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। राखी बांधने से पहले एक विशेष थाली सजाई जाती है। इस थाली में कौन-कौन सी 7 खास चीजें होनी चाहिए, यहां जानिए…

1.कुमकुम
किसी भी शुभ काम की शुरुआत कुमकुम का तिलक लगाकर की जाती है। ये परंपरा बहुत पुरानी है और आज भी इसका पालन किया जाता है। तिलक मान-सम्मान का भी प्रतीक है। बहन तिलक लगाकर भाई के प्रति सम्मान प्रकट करती है। साथ ही, अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर बहन उनकी लंबी उम्र की कामना भी करती है। इसलिए थाली में कुमकुम विशेष रूप से रखना चाहिए।
2. चावल
तिलक लगाने बाद तिलक के ऊपर चावल भी लगाए जाते हैं। चावल को अक्षत कहा जाता है। इसका अर्थ है अक्षत यानी जो अधूरा न हो। तिलक के ऊपर चावल लगाने का भाव यह है कि भाई के जीवन पर तिलक का शुभ असर हमेशा बना रहे।

3. नारियल
बहन अपने भाई को तिलक लगाने के बाद हाथ में नारियल देती है। नारियल को श्रीफल कहा जाता है। यह सुख-समृद्धि का प्रतीक है। बहन भाई को नारियल देकर यह कामना करती है कि भाई के जीवन में सुख और समृद्धि हमेशा बनी रहे।

4. रक्षा सूत्र (राखी)
रक्षा सूत्र बांधने से त्रिदोष शांत होते हैं। त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ। हमारे शरीर में कोई भी बीमारी इन दोषों से ही संबंधित होती है। रक्षा सूत्र कलाई पर बांधने से शरीर में इन तीनों का संतुलन बना रहता है। ये धागा बांधने से कलाई की नसों पर दबाव बनता है, जिससे ये तीनों दोष निंयत्रित रहते हैं। रक्षा सूत्र का अर्थ है, वह सूत्र (धागा) जो हमारे शरीर की रक्षा करता है। दरअसल, राखी बांधने का एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। बहन राखी बांधकर अपने भाई से उम्र भर रक्षा करने का वचन लेती हैं। भाई को भी ये रक्षा सूत्र इस बात का अहसास करवाता रहता है कि उसे हमेशा बहन की रक्षा करनी है।

5. मिठाई
राखी बांधने के बाद बहन अपने भाई को मिठाई खिलाकर उसका मुंह मीठा करती है। मिठाई खिलाना इस बात का प्रतीक है कि बहन और भाई के रिश्ते में कभी कड़वाहट न आए, मिठाई की तरह यह मिठास हमेशा बनी रहे।6. दीपक
राखी बांधने के बाद बहन दीपक जलाकर भाई की आरती भी उतारती है। इस संबंध में मान्यता है कि आरती उतारने से सभी प्रकार की बुरी नजरों से भाई की रक्षा हो जाती है। आरती उतारकर बहन कामना करती है कि भाई हमेशा स्वस्थ और सुखी रहे।
7. पानी से भरा कलश
राखी की थाली में जल से भरा हुआ एक कलश भी रखा जाता है। इसी जल को कुमकुम में मिलाकर तिलक लगाया जाता है। हर शुभ काम की शुरुआत में जल से भरा कलश रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी कलश में सभी पवित्र तीर्थों और देवी-देवताओं का वास होता है। इस कलश की प्रभाव से भाई और बहन के जीवन में सुख और स्नेह हमेशा बना रहता है।

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