उत्पन्ना एकादशी-मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष
उत्पन्ना एकादशी
हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है।

आधिकारिक नाम उत्पन्ना एकादशी व्रत
अनुयायी हिन्दू, भारतीय, भारतीय प्रवासी
प्रकार Hindu
उद्देश्य सर्वकामना पूर्ति
तिथि मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष में एकादशी
अनुक्रम
1 सन्दर्भ
2 उद्देश्य
3 उद्देश्य
4 इन्हें भी देखें
5 सन्दर्भ
सन्दर्भ
पद्मपुराणमें धर्मराज युधिष्ठिर के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से पुण्यमयीएकादशी तिथि की उत्पत्ति के विषय पर पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि सत्ययुग में मुर नामक भयंकर दानव ने देवराज इन्द्र को पराजित करके जब स्वर्ग पर अपना आधिपत्य जमा लिया, तब सब देवता महादेव जी के पास पहुंचे। महादेवजीदेवगणोंको साथ लेकर क्षीरसागरगए। वहां शेषनाग की शय्यापर योग-निद्रालीन भगवान विष्णु को देखकर देवराज इन्द्र ने उनकी स्तुति की। देवताओं के अनुरोध पर श्रीहरिने उस अत्याचारीदैत्य पर आक्रमण कर दिया। सैकडों असुरों का संहार करके नारायण बदरिकाश्रमचले गए। वहां वे बारह योजन लम्बी सिंहावतीगुफामें निद्रालीनहो गए। दानव मुर ने भगवान विष्णु को मारने के उद्देश्य से जैसे ही उस गुफामें प्रवेश किया, वैसे ही श्रीहरिके शरीर से दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से युक्त एक अति रूपवती कन्या उत्पन्न हुई। उस कन्या ने अपने हुंकार से दानव मुर को भस्म कर दिया। नारायण ने जगने पर पूछा तो कन्या ने उन्हें सूचित किया कि आतातायीदैत्य का वध उसी ने किया है। इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने एकादशी नामक उस कन्या को मनोवांछित वरदान देकर उसे अपनी प्रिय तिथि घोषित कर दिया। श्रीहरिके द्वारा अभीष्ट वरदान पाकर परम पुण्यप्रदाएकादशी बहुत खुश हुई।
उद्देश्य
जो मनुष्य जीवनपर्यन्तएकादशी को उपवास करता है, वह मरणोपरांत वैकुण्ठ जाता है। एकादशी के समान पापनाशक व्रत दूसरा कोई नहीं है। एकादशी-माहात्म्य को सुनने मात्र से सहस्रगोदानोंका पुण्यफलप्राप्त होता है। एकादशी में उपवास करके रात्रि-जागरण करने से व्रती श्रीहरिकी अनुकम्पा का भागी बनता है। उपवास करने में असमर्थ एकादशी के दिन कम से कम अन्न का परित्याग अवश्य करें। एकादशी में अन्न का सेवन करने से पुण्य का नाश होता है तथा भारी दोष लगता है। ऐसे लोग एकादशी के दिन एक समय फलाहार कर सकते हैं। एकादशी का व्रत समस्त प्राणियों के लिए अनिवार्य बताया गया है। मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष में एकादशी के उत्पन्न होने के कारण इस व्रत का अनुष्ठान इसी तिथि से शुरू करना उचित रहता है।
उद्देश्य
इस व्रत को करने वाला दिव्य फल प्राप्त करता है।
---------------------------
उत्पन्ना एकादशी के दिन एकादशी माता का जन्म हुआ था इसलिए इसे उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। एकादशी का दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
देवी एकादशी भगवान विष्णु की एक शक्ति का रूप है। मान्यता है कि उन्होंने इस दिन उत्पन्न होकर राक्षस मुर का वध किया था। इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है।
उत्पन्ना एकादशी व्रत का महत्व
मान्यता है कि जो मनुष्य उत्पन्ना एकादशी का व्रत पूरे विधि- विधान से करता है, वह सभी तीर्थों का फल व भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त करता है। धार्मिक मान्यता है कि उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखने से मनुष्य के पूर्वजन्म और वर्तमान दोनों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो व्यक्ति निर्जल संकल्प लेकर उत्पन्ना एकादशी व्रत रखता है, उसे मोक्ष व भगवान विष्णु की प्राप्ति होती है। व्रत के दिन दान करने से लाख गुना वृद्धि के फल की प्राप्ति होती है।
उत्पन्ना एकादशी व्रत की पूजा विधि
-एकादशी के दिन प्रात: काल उठकर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु का पूजन कर उन्हें पुष्प, जल, धूप, दीप, अक्षत अर्पित करें।
-उत्पन्ना एकादशी व्रत में भगवान विष्णु समेत देवी एकादशी की पूजा करें।
- इसके अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की दशमी को भोजन के बाद अच्छी तरह से दातून करना चाहिए ताकि अन्न का अंश मुंह में न रहे।
-व्रत रखने वाले को एक दिन पूर्व यानि दशमी की रात में भोजन नहीं करना चाहिए।
-अगले दिन द्वादशी को पारण करना चाहिए। किसी जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन व दान-दक्षिणा देना चाहिए। उसके बाद ही स्वयं भोजन कर व्रत खोलना उत्तम माना गया है।
उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार स्वयं श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी माता के जन्म की कथा सुनाई थी। यह कथा कुछ इस प्रकार थी:
सतयुग में मुर नामक राक्षस ने स्वर्ग लोक पर विजय प्राप्त कर ली थी। इससे घबराकर देवरात इंद्र ने भागवान विष्णुजी से मदद मांगी। विष्णुजी का मुर दैत्य से युद्ध आरंभ हो गया, जो कई वर्षों तक चला। अंत में विष्णुजी को नींद आने लगी तो वे बद्रिकाश्रम में हेमवती नामक गुफा में विश्राम करने चले गए। मुर भी उनके पीछे पहुंचा और सोते हुए भगवान को मारने के लिए बढ़ा तभी अंदर से एक कन्या निकली और उसने मुर से युद्ध किया। युद्ध में मुर राक्षस का सर वह कन्या धड़ से अलग कर देती है। मान्यता है कि उत्पन्ना एकादशी के दिन दैत्य मुर का वध किया था।
इसके बाद भगवान विष्णु की नींद खुलने पर उन्हें पता चला कि किस तरह उस कन्या ने भगवान विष्णु की रक्षा की है। इसपर भगवान विष्णु ने कन्या को देवी एकादशी का नाम देते हुए वरदान भी दिया कि तुम्हारी पूजा और व्रत करने वाले के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी।

Comments
Post a Comment