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वैशाख मास की कथा-

वैशाख मास की कथा-
पुराने जमाने में रतिदेव नामक एक राजा था। उसके राज्य में एक ब्राह्यण रहता था, जिसका नाम था-धर्मकेतु।धर्मकेतु की दो पत्नियाँ थीं। एक का नाम था सुशीला और दूसरी का नाम चंचलता था। दोनों पत्नियों के विचारों एंव व्यवहार में बहुत अन्तर था। सुशीला धार्मिक वृत्ति की थी और व्रत-उपवास, पूजा -अर्चना करती रहती थी। इसके विपरीत चंचलता भोग-विलास में मस्त रहती थी। वह शरीर के श्रृंगार पर ही अधिक ध्यान देती रहती थी। किसी व्रत-उपवास या पूजा अर्चना से उसका कुछ लेना-देना नहीं था।

कुछ दिनों बाद धर्मकेतु की दोनों पत्नियों के सन्तान हुईं। सुशीला के पुत्री हुई और चंचलता ने एक पुत्र को जन्म दिया। चंचलता सुशीला से कहती रहती थी- सुशीला! तूने इतने व्रत उपवास करके अपने शरीर को सुखा लिया, फिर भी तेरे लड़की हुई। मैंने कोई व्रत-उववास या पूजा-अर्चना नहीं की, फिर भी पुत्र को जन्म  दिया।

कुछ दिन तक तो सुशीला सुनती रही, पर जब अति हो गयी, तो उसे बड़ा दुःख हुआ। उसने गणेशजी की आराधना की। गणेशजी प्रसन्न हुए तो उनकी कृपा से सुशीला की पुत्री के मुँह से बहुमूल्य मोती-मूंगे निकलने लगे। एक रूपवान पुत्र भी उसने जन्मा।
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सुशीला का ऐसा सौभाग्य जगा, तो चंचलता के मन में जलन होने लगी। उसने सुशीला की बेटी को कुएं में गिरा दिया, पर सुशीला पर तो गणेशजी की कृपा थी। उसकी बेटी का  बाल भी बांका नहीं हुआ और वह सकुशल कुएं से निकाल ली गयी।
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चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से वैशाख मास स्नान आरंभ हो जाता है। यह स्नान पूरे वैशाख मास तक चलता है। 
स्कंदपुराण में वैशाख मास को सभी मासों में उत्तम बताया गया है। पुराणों में कहा गया है कि वैशाख मास में सूर्योदय से पहले जो व्यक्ति स्नान करता है तथा व्रत रखता है, वह भगवान विष्णु का कृपापात्र होता है। स्कंदपुराण में उल्लेख है कि महीरथ नामक राजा ने केवल वैशाख स्नान से ही वैकुण्ठधाम प्राप्त किया था। इसमें व्रती को प्रतिदिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व किसी तीर्थस्थान, सरोवर, नदी या कुएं पर जाकर अथवा घर पर ही स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद सूर्योदय के समय अध्र्य देते समय नीचे लिखा मंत्र बोलना चाहिए-
वैशाखे मेषगे भानौ प्रात: स्नानपरायण:।
अध्र्यं तेहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन।।
वैशाख व्रत महात्म्य की कथा सुनना चाहिए तथा ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए। व्रती को एक समय भोजन करना चाहिए। वैशाख मास में जलदान का विशेष महत्व है। इस मास में प्याऊ की स्थापना करवानी चाहिए। पंखा, खरबूजा एवं अन्य फल, नवीन अन्न आदि का दान करना चाहिए।
स्कंदपुराण के अनुसार इस मास में तेल लगाना, दिन में सोना, कांसे के बर्तन में भोजन करना, दो बार भोजन करना, रात में खाना आदि वर्जित माना गया है। वैशाख मास के देवता भगवान मधुसूदन हैं।

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