रंभा तीज-
अभी हिन्दी पंचांग का तीसरा माह ज्येष्ठ चल रहा है। इस माह में पानी की बचत करने का और जल का दान करने का महत्व काफी अधिक है। 2 जून को ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। सालभर की सभी एकादशियों में इस एकादशी का महत्व काफी अधिक है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार इस एकादशी पर निर्जल रहकर उपवास करना होता है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं।
सूर्य पूजा करने की परंपरा
ज्येष्ठ मास में सूर्य अपने पूरे प्रभाव में रहता है। गर्मी बढ़ती है। वाष्पीकरण अधिक होता है। नदी, तालाब सूखने लगते हैं, जमीन का जल स्तर काफी नीचे चला जाता है। ऐसी स्थिति में इन दिनों में जल का अपव्यय नहीं करना चाहिए। जल का दान करें। अगर संभव हो तो कहीं प्याऊ लगवा सकते हैं या किसी प्याऊ में मटके का दान कर सकते हैं। घर के बाहर या घर की छत पर पक्षियों के दाना-पानी रखें। रोज सुबह जल्दी उठें और सूर्य की पूजा करें। खान-पान में लापरवाही न करें।
सूर्य जल चढ़ाएं
इस माह में सुबह जल्दी उठें और स्नान के बाद सूर्य को तांबे के लोटे से जल चढ़ाकर ऊँ सूर्याय नम: मंत्र का जाप करें। जल चढ़ाते समय लोटे में लाल फूल और चावल भी जरूर डालें।
पूर्णिमा पर करें भगवान सत्यनारायण की कथा
ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा है। इस तिथि पर भगवान सत्यनारायण की कथा करें। जरूरतमंद लोगों को धन और अनाज का दान करें। शिवलिंग पर दूध अर्पित करें।
हमारे मन में जब तक इच्छाएं रहेंगी, हमारा मन भगवान की भक्ति में नहीं लग सकता
ध्यान / हमारे मन में जब तक इच्छाएं रहेंगी, हमारा मन भगवान की भक्ति में नहीं लग सकता
जब तक अच्छी बातों को अपने जीवन में नहीं उतारेंगे, तब तक इनसे कोई लाभ नहीं मिलेगा
कथा / जब तक अच्छी बातों को अपने जीवन में नहीं उतारेंगे, तब तक इनसे कोई लाभ नहीं मिलेगा
जो लोग माता-पिता का सम्मान और परिवार से प्रेम नहीं करते, वे भक्ति नहीं कर पाते हैं
कथा / जो लोग माता-पिता का सम्मान और परिवार से प्रेम नहीं करते, वे भक्ति नहीं कर पाते हैं
बुरी बातों को याद रखने से हमारा मन अशांत रहता है, ऐसी बातों को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए
जीवन प्रबंधन / बुरी बातों को याद रखने से हमारा मन अशांत रहता है, ऐसी बातों को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए
हमारे मन में जब तक इच्छाएं रहेंगी, हमारा मन भगवान की भक्ति में नहीं लग सकता
ध्यान / हमारे मन में जब तक इच्छाएं रहेंगी, हमारा मन भगवान की भक्ति में नहीं लग सकता
जब तक अच्छी बातों को अपने जीवन में नहीं उतारेंगे, तब तक इनसे कोई लाभ नहीं मिलेगा
कथा / जब तक अच्छी बातों को अपने जीवन में नहीं उतारेंगे, तब तक इनसे कोई लाभ नहीं मिलेगा
जो लोग माता-पिता का सम्मान और परिवार से प्रेम नहीं करते, वे भक्ति नहीं कर पाते हैं
कथा / जो लोग माता-पिता का सम्मान और परिवार से प्रेम नहीं करते, वे भक्ति नहीं कर पाते हैं
बुरी बातों को याद रखने से हमारा मन अशांत रहता है, ऐसी बातों को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए
जीवन प्रबंधन / बुरी बातों को याद रखने से हमारा मन अशांत रहता है, ऐसी बातों को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए
हमारे मन में जब तक इच्छाएं रहेंगी, हमारा मन भगवान की भक्ति में नहीं लग सकता
ध्यान / हमारे मन में जब तक इच्छाएं रहेंगी, हमारा मन भगवान की भक्ति में नहीं लग सकता
जब तक अच्छी बातों को अपने जीवन में नहीं उतारेंगे, तब तक इनसे कोई लाभ नहीं मिलेगा
कथा / जब तक अच्छी बातों को अपने जीवन में नहीं उतारेंगे, तब तक इनसे कोई लाभ नहीं मिलेगा
जो लोग माता-पिता का सम्मान और परिवार से प्रेम नहीं करते, वे भक्ति नहीं कर पाते हैं
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बुरी बातों को याद रखने से हमारा मन अशांत रहता है, ऐसी बातों को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए
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समुद्र मंथन से प्रकट हुई थी अप्सरा रंभा, विश्वामित्र के श्राप से बन गई थी पत्थर की मूर्ति
रंभा तीज / समुद्र मंथन से प्रकट हुई थी अप्सरा रंभा, विश्वामित्र के श्राप से बन गई थी पत्थर की मूर्ति
25 मई को दिखेगा चांद, निरोगी रहने के लिए किए जाते हैं चंद्र दर्शन
ब्रह्मांड पुराण / 25 मई को दिखेगा चांद, निरोगी रहने के लिए किए जाते हैं चंद्र दर्शन
यजुर्वेद के अनुसार दिव्य तीर्थ के जलों में होता है अप्सराओं का वास
वेदों और पुराणों में अप्सराओं के बारे में बताया गया हैं। इनके अनुसार इंद्र की सभा में प्रमुख अप्सराएं रहती हैं। उनमें प्रमुख रंभा और अन्य कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, रम्भा, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, उर्वशी, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा थीं। ऋग्वेद में उर्वशी प्रसिद्ध अप्सरा मानी गई है। यजुर्वेद के अनुसार पानी में अप्सराओं का वास होता है। वहीं अथर्ववेद के अनुसार पीपल और वट वृक्ष यानी बरगद या अन्य पेड़ पर अप्सराएं रहती थीं। सामवेद के अनुसार गायन, नृत्य और देवी-देवताओं की पूजा इनका प्रमुख काम होता है।
पुराणों में रंभा के बारे में बताया गया है कि वो समुद्र मंथन से प्रकट हुई थी। इसके बाद इंद्र ने रंभा को अपनी राजसभा में स्थान दिया। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार रंभा ने विश्वामित्र की तपस्या भंग करने की कोशिश की थी। जिससे गुस्से में आकर विश्वामित्र ने उसे कई सालों तक पत्थर की मूर्ति बनी रहने का श्राप दे दिया। इसके बाद रंभा ने भगवान शिव-पार्वती की पूजा से सामान्य शरीर पाया।
अप्सरा रंभा के नाम से 2 व्रत
अप्सरा रंभा के नाम से ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की तृतीया का व्रत किया जाता है। इसे रंभा तीज कहा जाता है। इसको करने से सौभाग्य और संतान सुख मिलता है और पति की उम्र भी बढ़ती है। इसके अलावा भगवान विष्णु की कृपा से कार्तिक महीने के कृष्णपक्ष की एकादशी को रम्भा एकादशी व्रत किया जाता है। जो कि चातुर्मास की आखिरी एकादशी होती है। इसलिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। ये व्रत भी खासतौर से महिलाओं के लिए है।
अप्सरा रंभा से जुड़ी खास बातें
रंभा अपने रूप और सौन्दर्य के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी।
कुछ पुराणों में प्रसिद्ध अप्सरा रंभा का स्थान कुबेर की सभा में माना गया है।
इन्द्र ने देवताओं से रंभा को अपनी राजसभा के लिए प्राप्त किया था।
स्वर्ग में अर्जुन के स्वागत के लिए रंभा ने नृत्य किया था।
महाभारत में इसे तुरुंब नाम के गंधर्व की पत्नी बताया गया है।
रंभा कुबेर के पुत्र नलकुबर के साथ पत्नी की तरह रहती थी।
रावण संहिता में बताया है कि रावण ने रंभा के साथ बल का प्रयोग करना चाहा था, जिससे उसने रावण को श्राप दिया था।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार विश्वामित्र के श्राप से पत्थर की मूर्ति बनी रंभा एक ब्राह्मण के द्वारा ऋषि के शाप मुक्त हुई।
स्कन्दपुराण में इसके श्वेतमुनि के छोड़े गए बाण से रंभा को सामान्य रूप मिला।

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